रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भारत की हरित विकास यात्रा में सस्टेनेबल सामग्री की भूमिका पर ज़ोर दिया

बीसीएमएल और लखनऊ कैंटोनमेन्ट बोर्ड में बायोप्लास्टिक के अडॉप्शन हेतु ऐतिहासिक पहल
लखनऊ। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सस्टेनेबिलिटी एवं जि़म्मेदाराना उपभोग के लिए अपनी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए बलरामपुर चीनी मिल्स लि ने लखनऊ छावनी बोर्ड के सहयोग से शुक्रवार को बायोगुय ग्रीन कमांड-26 का औपचारिक लॉन्च किया। अपनी तरह का पहला प्लेटफॉर्म भारत के बायोप्लास्टिक इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। इस पहल का उद्घाटन भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में हुआ, जो इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उनकी उपस्थिति पर्यावरण के प्रति जि़म्मेदार इनोवेशन, स्वदेशी निर्माण और पारंपरिक प्लास्टिक के सस्टेनेबल विकल्पों पर देश के बढ़ते फोकस को दर्शाती है। कार्यक्रम के दौरान बलरामपुर बायोयुग और लखनऊ छावनी बोर्ड के बीच एक औपचारिक साझेदारी की शुरुआत हुई। इससे पहले इसी साल एक ऐतिहासिक एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे तथा बीसीएमएल ने कम्पोस्टेबल पीएलए-आधारित उत्पादों के लिए अपना पहला संस्थागत ऑर्डर दिया था। इस पहल का उद्देश्य यह दर्शाना है कि कैसे सस्टेनेबल सामग्री प्लास्टिक व्यर्थ को कम करने, जि़म्मेदार उपभोग को बढ़ावा देने और भारत के व्यापक पर्यावरणीय लक्ष्यों में योगदान दे सकती है। कार्यक्रम की शुरुआत भारत की उभरती बायोप्लास्टिक वैल्यू चेन को दर्शाने वाली प्रदर्शनी से हुई। आईटीआई की छात्राओं को सम्मानित किया गया। यह सम्मान बिल्डिंग स्किल्स-ट्रांसफोर्मिंग फ्यूचर्स बलरामपुर बायोयुग बायोप्लास्टिक 3डी प्रिंटिंग प्रोजेक्ट के व्यापक विज़न को दर्शाता है। महिलाओं पर केंद्रित इस पहल की शुरूआत लखीमपुर खेड़ी में बलरामपुर फाउंडेशन द्वारा बलरामपुर बायोयुग और आईटीआई मोहम्मदी के सहयोग से की गई। इसका उद्देश्य युवतियों को बायोयुग पीएलए के इस्तेमाल द्वारा 3डी प्रिंटिंग में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के ज़रिए आधुनिक निर्माण कौशल के साथ सशक्त बनाना है ताकि उन्हें रोज़गार और उद्यमिता के नए अवसर मिल सकें। यह कार्यक्रम नीति-निर्माताओं, रक्षा प्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों, उद्योग जगत के लीडरों, शोध संस्थानों और इकोसिस्टम पार्टनर्स को एक मंच पर लाया, जिन्होंने भारत में सस्टेनेबल सामग्री के भविष्य पर चर्चा की। बलरामपुर चीनी मिल्स लि के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर विवेक सराओगी ने कहा भारत अपनी सस्टेनेबिलिटी यात्रा के एक अहम मोड़ पर है, जहाँ आर्थिक विकास और पर्यावरण के प्रति जि़म्मेदारी को साथ आगे बढ़ना होगा। पारंपरिक सामग्री से सस्टेनेबल विकल्पों की ओर बढ़ना न सिर्फ पर्यावरण के लिए ज़रूरी है, बल्कि यह नए उद्योग बनाने स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने और समाज को दीर्घकालिक मूल्य प्रदान करने का मौका भी है। बायोयुग ग्रीन कमांड के ज़रिए हम सरकार उद्योग जगत संस्थानों और समुदायों को साथ ला रहे हैं ताकि इस बदलाव को आगे बढ़ाया जा सके। बलरामपुर चीनी मिल्स की एक्ज़क्टिव डायरेक्टर अवंतिका सराओगी ने कहा बायोमटीरियल्स की ओर बढ़ना न सि$र्फ पर्यावरण के लिए ज़रूरी है, बल्कि यह एक आर्थिक अवसर भी है। इसका उद्देश्य किसानों को सशक्त बनाना तथा नए उद्योगों एवं आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना है। पिछली सदी तेल और पेट्रोकेमिकल्स की थी; अगली सदी किसानों और खेतों की हो सकती है। भविष्य की चीज़ें न सिर्फ ज़मीन के नीचे से निकाली जाएँगी, बल्कि खेती के ज़रिए ज़मीन के ऊपर भी उगाई जाएँगी। इस अवसर पर प्रदेश के उपमुख्य मंत्री बृजेश पाठक मेयर सुषमा खरवार और विधायक मौजूद रहे। Defence Minister Shri Rajnath Singh पर्यावरण के लिए हम सब ने मिलकर एक historical initiative started किया है और आप सब जिस तरह से पर्यावरण को ध्यान में रखकर काम कराएं, वह पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी का बहुत बड़ा उदाहरण है। बल्कि मैं तो हमेशा कहता हूँ कि यह भारत के भविष्य, हमारे साथ-साथ दर-दर और एक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ एक बहुत ही प्रभावी कदम है। इसलिए मुझे यह देखकर बेहद खुशी हो रही है कि यह कदम जमीनी स्तर पर आप सब के सहयोग से उठाया जा रहा है। साथियों, जब तक बदलते हुए उत्तर प्रदेश की तस्वीर है, लगभग एक दशक पहले तक प्रदेश में गन्ना की फसल को उसकी कीमत नहीं मिल पाती थी और चीनी मिलों की भी स्थिति भी अच्छी नहीं थी। कई समय तक कृषि और बायो इकॉनमी के लिए देश अच्छी नहीं थी । लेकिन आज मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि हमारे मुख्यमंत्री योगीनाथ जी, योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में हमारा उत्तर प्रदेश बदल चुका है। गन्ने के लिए एक अच्छी कीमत तय की गई है और बायो इकॉनमी के नाम पर प्रभावी तरीके से लिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में बाहुबली युग से आगे बढ़कर आज बायो युग की बात कर रहे हैं। यह परिवर्तन दवलिया से शुरू हुआ। यह परिवर्तन दवलिया से शुरू कर अन्य मरीजों के लिए उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। साथियों, आज पूरा विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है। जब पर्यावरण की बात करते हैं तो काम का प्रकार है जहाँ वृक्ष के पौधे लगाने, पानी बचाने और प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम किया जाए, इसी पर केंद्रित है। यह सब जरूरी है, पर मैं जरूरी नहीं मानता मैं तो बहुत ही जरूरी मानता हूँ। इसलिए आज मैं आप सभी से यह request कर रहा हूँ कि ऐसे विषय पर बात करना चाहता हूँ कि पर शायद बहुत कम लोग इस जैसा प्रयास नहीं करते। साथियों, क्या हमने कभी सोचा है जो हम इस्तेमाल करते हैं, वह कहां से आता है? क्या हमने कभी सोचा है कि हमारी इस दुनिया के लिए जो भी इसके ऊपर जो इस वजह से हो रहे loss हैं, जो death हैं, वो पर्यावरण के साथ-साथ माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारी जमीन के भीतर तक भी enter कर रहे हैं। साथियों, वैज्ञानिकों द्वारा किए गए research से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक यानी प्लास्टिक के कण common और शिशुओं के blood तक में पाए जाते हैं। जब भी एक नवजात बच्चे के blood की जांच की कराई जाए तो उसमें भी प्लास्टिक के बहुत ही small माइक्रो पार्टिकल्स बहुत छोटे-छोटे पार्टिकल्स मिल रहे हैं। यह है हमारे इस सुधार की कीमत। हम बोतल बंद पानी पीते हैं। प्लास्टिक के डिब्बों में हम खाना खाते हैं तो हर सांस के साथ हर कदम के साथ हम प्लास्टिक को अपने भीतर उतार रहे हैं। साथियों, मैं कोई डरावनी कहानी यहां पर नहीं बता रहा हूँ, बल्कि यह वैज्ञानिक तथ्य है जो अब हर दिन नए-नए research सामने ला रहे हैं। पिछले ही साल Science के एक journal में एक report प्रकाशित हुई थी। इस report में यह कहा गया था कि दुनिया भर में हर साल लगभग साढ़े तीन लाख लोगों की death माइक्रोप्लास्टिक के कारण होती है। एक report बताती है कि हर साल लगभग 1 मिलियन marine mammals की death पानी consume करने के कारण होती है। हर साल लगभग 25 billion ton प्लास्टिक हमारी धरती में जा रहा है। 25 billion ton प्लास्टिक हमारी नदी में जा रहा है। पानी का नदी है या नहीं, हमारी सेहत पर इस effect पड़ा है सब पता है। हमारी आने वाली पीढ़ियां बीमारियों के साथ चल रहे हैं और हम चुपचाप बैठे हुए देख रहे हैं। और साथियों, यह केवल इंसानों तक ही सीमित नहीं है। आज समुद्र में भी प्लास्टिक के पहाड़ बन गए हैं और अनगिंत समुद्री जीव, मछलियां, प्लास्टिक को भोजन समझकर खा रहे हैं और उनकी death हो रही है। सहिष्णु प्रजातियां खत्म होने के कगार पर हैं। सब जानते ही हैं कि बहुत सारी प्रजातियां समाप्त होने के कगार पर हैं। हमारी नदियां, हमारी जमीन, हमारी हवा सब में प्लास्टिक है। कोई चीज नहीं जो प्लास्टिक हम फेंकने पर सहजता से मिट्टी में पड़ा रहता है और जमीन को बंजर करता है, पानी को विषैला करता है। हमारे प्लास्टिक के बारे में कोई मजबूरी नहीं है। प्लास्टिक का जीवन को आसानी से टालने का तरीका अपनी समस्या है। धरती खंडित है। उसको फेंकने का हमारा अधिकार नहीं है, प्लास्टिक एक necessary evil यानी एक आवश्यक बुराई है। और इसी हिसाब से आज Chini Mills ने जो कदम उठाया है, वह एक काफी सराहनीय कदम है। अब अंग्रेजी में PLA यानी Poly Lactic Acid होता है। PLA एक तरह का Bio plastic होता है। आप सभी जानते हैं जो पूरी तरह ऑर्गनिक। यानी समय के साथ मिट्टी में मिल जाता है। इसे प्रकृति Digest कर लेती है और गाय के सर से गाय के सर से यह सामने आता है कि PLA Micro plastic 180 days में यानी 180 दिनों में ही यह completely डाइजेस्ट हो जाता है। finish हो जाता है। इसका मतलब PLA Micro plastic पर्यावरण को नुकसान नहीं करता है और सबसे बड़ी बात यह बन रहा है कि हमारे अपने खेत में उगने वाले गन्ने से । हमें पता है सीमावर्ती क्षेत्रों में जब भी तमाव होता है तो supply problem होती है। फिर उसका सीधा असर Plastic industry पर पड़ता है। अभी आप सब देखते ही रहे middle east में क्या-क्या चल रहा था और ठीक-ठाक समय पर supply chain बाधित थी। उससे कई Plastic कंपनियां प्रभावित हुई क्योंकि उन्हें कच्चा माल ही नहीं मिलता था। लेकिन जब हम गन्ने से Bio plastic बनाएंगे तो हमारी निर्भरता विदेशों पर कम होगी और हम धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनते जाएंगे। , PLA दुनिया के सबसे सस्ते Bio plastic में से एक है और जब यह dispose हुआ तो यह कचरा नहीं खाद बनेगा। मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाएगा। यानी कि इससे हर तरीके से फायदा ही फायदा। कहीं से कोई नुकसान नहीं। हमारे किसानों को भी फायदा, देश का भी इससे फायदा और पर्यावरण का भी फायदा। , सरकार अपनी Bio plastic industry policy के माध्यम से इसके निर्माण को बढ़ावा दे रही है। हमारे सामने असीमित संभावनाएं हैं। Bio plastic का market लगातार बढ़ रहा है। कई अर्थशास्त्रियों के अनुसार 2075-2090 तक इसके market की total value 120 billion dollar तक होगी। इसी तरह पर Ethanol का मामला भी। आज भारत में petrol में 20% तक ethanol blending है। यह अगर 35% कर दें तो आज हम आत्मनिर्भर हैं। जब पश्चिम एशिया में संकट आया, देश अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से झेल पाया क्योंकि हमने 20% Ethanol तो अपने ही यहां produce कर लिया। जरा सोचिए क्या अगर उस 20% के लिए भी भारत पर निर्भरता संकट इतना बड़ा। और यह 20% एक तरह से हमारे लिए मौका था। इससे हमने अपनी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होने से बचाया। यानी domestic supply और पर्यावरण के प्रति जागरूकता, हमारी आर्थिक सुरक्षा और वार्षिक इस चर्चा में बहुत बड़ा योगदान था। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की Geo political व्यवस्था पूरी तरह से बदल गई। इसमें हमें एक कठोर सच्चाई भी दिखाई दी और यह जो supply chain भी बड़ी जल्दी तनाव में आ सकती है। Geo political crisis बहुत जल्दी Economic और Industrial crisis में बदल जाती है। हमें अपनी energy source को diversify करना होगा। अपनी घरेलू क्षमता को बढ़ाना, बढाना होगा। ऐसी supply chain भी तैयार करनी होगी जो स्वदेशी क्षमता पर भी काम कर सके। भारत जैसे बड़े देश की यह weakness कभी नहीं होनी चाहिए। जब हम अपने गन्ने, अपने चावलो, अपने जैविक कचरे से resources बनाएंगे तो हम अपनी सुरक्षा cover को भी और मजबूत करेंगे और अपने नागरिकों को भी बचाने में कामयाब होंगे। यानी पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों को निभाते हुए हम आत्मनिर्भर Bio based economy बन सकते हैं और यही आत्मनिर्भर और यही आत्मनिर्भर यही आत्मनिर्भर हमें Plastic सुरक्षा के बुद्धे और भाई भी बनाए रख सकता है।

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