पं बंगाल के नतीजे तय करेंगे लोकतंत्र का भविष्य: हुजै़फा

वैसे इस बार पं बंगाल विधानसभा चुनाव-26 के नतीजे केवल एक राज्य की सरकार तय नहीं करेंगे, बल्कि वह भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की नई पटकथा लिखेंगे। अब हर गली-मुहल्ले और सभी की बातों में बंगाल चुनाव, भाजपा की रणनीति और उस पर दीदी की दूरदर्शिता का जिक्र है। चाय की दुकान हो या घर-आफिस सबके मन में एक ही यक्ष प्रश्न है अगर बीजेपी ने बंगाल फतह कर लिया, तो क्या होगा? बंगाल, जो पिछले डेढ़ दशक से ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग रहा है, अगर वहां भगवा परचम लहराता है, तो इसके परिणाम केवल कोलकाता तक सीमित नहीं रहेंगे। यह एक ऐसा राजनीतिक भूकंप होगा जिसकी गूँज दिल्ली के सत्ता के गलियारों से लेकर कन्याकुमारी तक सुनाई देगी। आइए गहराई से समझते हैं कि इस संभावित सत्ता परिवर्तन के बाद बंगाल और देश की राजनीति में किस तरह के क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। बंगाल में प्रशासनिक और सिस्टम का कायाकल्प-अगर बीजेपी बंगाल की सत्ता में आती है, तो सबसे पहला और बड़ा बदलाव राज्य के प्रशासनिक ढांचे में देखने को मिलेगा। बीजेपी ने अपने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सिंडिकेट राज और कट मनी को खत्म करने का वादा किया है। सत्ता परिवर्तन के साथ ही बंगाल में उस कैडर आधारित व्यवस्था पर प्रहार होगा जो दशकों से वामपंथियों और फिर टीएमसी के शासन का आधार रही है। बीजेपी शासित राज्यों की तर्ज पर यहां भी प्रशासनिक अधिकारियों की बड़ी फेरबदल होगी और केंद्र की योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत और किसान सम्मान निधि को प्राथमिकता के साथ लागू किया जाएगा। बंगाल की पुलिसिंग व्यवस्था में काफी परिवर्तन की संभावना है, क्योंकि बीजेपी का आरोप रहा है कि राज्य पुलिस का राजनीतिकरण हो चुका है। ऐसे में एक 'न्यूट्रलÓ और सख्त कानून-व्यवस्था लागू करना बीजेपी की पहली प्राथमिकता होगी। यादि ममता और टीएमसी अपनी रणनीति में असफल हुई तो क्या होगा यह सवाल भी लोगों की जुबान पर है। लगातार तीन बार शानदार जीत दर्ज करने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी के लिए यह हार किसी अस्तित्व के संकट से कम नहीं होगी। टीएमसी एक ऐसी पार्टी है जो पूरी तरह से ममता बनर्जी के करिश्माई नेतृत्व और सत्ता की ताकत के इर्द-गिर्द घुमती है। अगर सत्ता हाथ से निकलती है, तो पार्टी के भीतर बड़े पैमाने पर टूट और भगदड़ देखने को मिल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता जाने के बाद टीएमसी के कई कद्दावर नेता और जमीनी कार्यकर्ता बीजेपी या वापस लेफ्ट की ओर रुख कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की धुरी मानी जाने वाली ममता का राजनीतिक कद छोटा हो जाएगा। उनकी बंगाली अस्मिता की राजनीति को कड़ी चुनौती मिलेगी और पार्टी को फिर से खड़ा करना उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी। बंगाल जीतने के बाद बीजेपी केवल एक राज्य नहीं जीतेगी, बल्कि वह एक ऐसा विमर्श जीतेगी जो उसे अजेय बना देगा। उत्तर भारत और पश्चिम भारत में मजबूत पकड़ रखने वाली बीजेपी के लिए बंगाल की जीत 'पूर्वी भारतÓ के द्वार खोल देगी। यह जीत साबित करेगी कि बीजेपी की हिंदुत्व और विकास की राजनीति अब भाषाई और सांस्कृतिक सीमाओं को पार कर चुकी है। 29 के लोकसभा चुनाव के लिए यह जीत बीजेपी के लिए लॉन्चपैड का काम कर सकती है। राज्यसभा में बीजेपी की ताकत बढ़ेगी, जिससे कड़े और विवादित कानूनों को पास कराना सरकार के लिए आसान हो जाएगा। इससे बीजेपी का यह आत्मविश्वास उड़ीसा और दक्षिण भारत के राज्यों में भी पार्टी के विस्तार को नई ऊर्जा देगा। पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक बदलाव-बंगाल हमेशा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए जाना जाता रहा है। बीजेपी की जीत के साथ ही बंगाल की इस सांस्कृतिक पहचान में हिंदुत्व का रंग गहरा होगा। जय श्री राम का नारा, जो अब तक केवल एक चुनावी मुद्दा था, वह राज्य की नई पहचान बन सकता है। दुर्गा पूजा और अन्य उत्सवों के भव्य आयोजन में सरकारी और राजनीतिक भागीदारी का स्वरूप बदल जाएगा। सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दों पर बीजेपी सरकार आगे बढ़ेगी जिसे दीदी ने रोक दिया था। जिससे सीमावर्ती इलाकों के जनसांख्यिकीय समीकरणों पर गहरा असर पड़ेगा। यह बदलाव बंगाल के उस बौद्धिक वर्ग के लिए एक बड़ा झटका होगा जो दशकों से उदारवादी और वामपंथी विचारधारा का पोषण करता रहा है। औद्योगिक पुनरुद्धार और आर्थिक दिशा बंगाल के आर्थिक परिदृश्य के लिए बीजेपी की जीत डबल इंजन सरकार का वादा लेकर आएगी। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों के बाद बंगाल की छवि एक इंडस्ट्री विरोधी राज्य की बन गई थी। बीजेपी केंद्र के साथ तालमेल बिठाकर बड़े औद्योगिक घरानों को फिर से बंगाल लाने की कोशिश करेगी। आईटी सेक्टर, विनिर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भारी निवेश की उम्मीद की जा सकती है। हुगली किनारे बंद पड़ी जूट मिलों और चाय बागानों के लिए विशेष पैकेज की घोषणा हो सकती है। बीजेपी का मुख्य एजेंडा बंगाल को विकसित भारत के नक्शे पर अग्रणी बनाना होगा, जिससे युवाओं के पलायन को रोका जा सके। क्या वाकई बदलेगा बंगाल का भाग्य अब सवाल है अगर बीजेपी बंगाल फतह करती है, तो यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं होगा, बल्कि एक पूरी विचार प्रक्रिया का बदलाव होगा। यह सोनार बांग्ला के सपने और ममता के संघर्ष के बीच की जंग का नतीजा होगा। जहां दीदी की टीएमसी के लिए यह करो या मरो की स्थिति है, वहीं बीजेपी के लिए यह अपनी विचारधारा की बड़ी जीत हो सकती। हालांकि बंगाल की जनता का मिजाज हमेशा से अप्रत्याशित रहा है। आज 4 मई के नतीजे यह तय करेंगे कि बंगाल अपनी पुरानी परंपराओं के साथ चलेगा या एक नई और भगवा दिशा में कदम बढ़ाएगा। फिलहाल यह तय है कि इस महामुकाबले के बाद बंगाल की राजनीति वैसी नहीं रहेगी जैसी आज है।

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