होली जीवन में सकारात्मक, प्रेम और सद्भावना का संदेश देती है : महंत विशाल गौड़
खुशियों और मीठास से जुड़ा है होली का त्योहार
होली हिन्दू धर्म का प्रमुख त्योहार है, जिसे फागुन मास के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस त्योहार में लोग आपस में रंग फेकते हैं, पिचकारी से पानी उड़ाते हैं और मिठाई व गुझिया खाते हैं। होली का महत्व हमारे जीवन में खुशियों और मीठास को जोड़कर एक खास स्थान रखता है। यह एकता, मित्रता और भाईचारे का प्रतीक है। होली वसंत और ग्रीष्म ऋतुओं के मध्य में मनाई जाती है। पहले दिन के उत्सव के बाद लोग रंगों से खेलते हुए गीत गाते हुए कहानियां सुनाते हुए, नाचते हुए और घर में बनी मिठाइयों का आनंद लेते हुए होली मनाते हैं। भारतीय अपने सभी त्योहारों से भलीभांति परिचित हैं, और होली सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है।
होली 3 मार्च को चंद्रग्रहण के कारण इस बार 4 मार्च को खेली जायेगी। इसी कारण 3 मार्च को रंग खेलने की परंपरा नहीं होगी और 4 मार्च को रंगभरी होली मनाई जाएगी। इस बारे में जानकारी देते हुए श्री कोतवालेश्वर महादेव मंदिर के महंत विशाल गौड़ ने बताया होली आकर्षक और मनोहर रंगों का त्योहार है, यह हर धर्म, संप्रदाय, जाति के बंधन की सीमा से परे जाकर लोगों को भाई-चारे का संदेश देता है। इस दिन लोग गिले-शिकवे भूलकर गले मिलते हैं और एक दूजे को गुलाल लगाते हुए बधाई देते है। ग्रहण और सूतक की वजह से 4 मार्च को रंगों की होली (धुलंडी) मनाई जाने की सलाह दी गयी है। होलिका दहन (छोटी होली) मंगलवार 2 मार्च 2026 को होगा। होलिका दहन रंगों के त्योहार से एक रात पहले मनाया जाता है। इस दिन लोग एक विशाल अग्नि के चारों ओर एकत्रित होते हैं, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। होलिका दहन की कथा भगवान विष्णु के महान भक्त भरत और उनकी मौसी होलिका से जुड़ी है।
होली सबसे पहले किसने खेली थी? होली का त्योहार राक्षस राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका की कथा से जुड़ा है। हिरण्यकश्यप स्वयं को अजेय मानता था और उसने आदेश दिया था कि उसकी पूजा भगवान के रूप में की जाए। हालांकि उसके पुत्र प्रहलाद ने इस आदेश का उल्लंघन किया और भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा करता रहा। होली का पहला दिन जिसे होलिका दहन कहा जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है। इसके अगले दिन को रंगवाली होली , फागवाह या बड़ी होली कहा जाता है, जब लोग गुलाल या आबीर और रंगीन पानी से खेलते हैं।
महंत ने बताया होली का मुख्य पौराणिक जन्मस्थान बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी स्थित सिकलीगढ़ धरहरा को माना जाता है, जहाँ होलिका भक्त प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी थीं और स्वयं जल गई थीं। कुछ मान्यताओं के अनुसार उत्तर प्रदेश के झांसी के पास एरच को भी होलिका दहन का स्थान माना जाता है।
ऋषि गार्ग द्वारा रचित पौराणिक ग्रंथ गार्ग संहिता, होली खेलते हुए राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंग का वर्णन करने वाला पहला साहित्यिक ग्रंथ है। इस त्योहार के पीछे एक प्रतीकात्मक कथा भी है। अपने यौवनकाल में, कृष्ण इस बात को लेकर चिंतित थे कि क्या गोरी राधा उनके सांवले रंग के कारण उन्हें पसंद करेंगी।
प्रह्लाद स्तंभ: बिहार के बनमनखी के सिकलीगढ़ में आज भी वह स्थान मौजूद है जहाँ होलिका जली थी, जिसे प्रह्लाद स्तंभ के रूप में जाना जाता है। अन्य मान्यता के अनुसार वृंदावन/बरसाना से भी होली का संबंध राधा-कृष्ण के प्रेम के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन होलिका दहन की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के अनुसार बिहार/उत्तर प्रदेश के उक्त स्थलों से ही मानी जाती है। होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई, और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया, उसका विश्वास अविचलित रहा। इस विजय का जश्न मनाने के लिए, होली की पूर्व संध्या पर समुदाय होलिका दहन के लिए एकत्रित होते हैं। ये अग्नि इस बात का स्मरण दिलाती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह सत्य के प्रकाश के सामने कभी टिक नहीं सकती। इस साल का पहला पूर्ण चंद्रग्रहण 3 मार्च 2026 को होगा, जो एक अद्भुत खगोलीय नजारा पेश करेगा। भारत में इस घटना को चंद्रग्रहण के नाम से जाना जाता है और इसे आंखों से देखा जा सकता है। इसके लिए बस आसमान का साफ नजारा और इसे देखने के लिए कुछ शांत क्षण चाहिए। मार्च 2026 को पूर्ण चंद्र ग्रहण (जिसे ब्लड मून भी कहा जाता है) होने वाला है, जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा को पूरी तरह से ढक लेगी। यह एक नाटकीय खगोलीय घटना होगी जो भारत के कुछ हिस्सों और दुनिया भर में दिखाई देगी।
रंगवाली होली, जिसे धुलंडी के नाम से भी जाना जाता है, बुधवार 4 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन भारत भर के लोग रंगों से खेलने, गुलाल लगाने और शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए एक साथ आएंगे, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
होली मनाने के पीछे सबसे ज्यादा प्रचलित कथा है कि यह त्यौहार हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के मारे जाने की स्मृति में मनाया जाता है। होलिका दहन के बाद ही होली मनाई जाती। हिरण्यकश्यप के मरने से पहले ही होलिका के रूप में बुराई जल गई और अच्छाई के रूप में भक्त प्रहलाद बच गए। कुछ मान्यताओं के अनुसार झांसी से होली की शुरुआत हुई थी। जिस होली के त्योहार को पूरे देश में मनाया जाता है, उसकी शुरुआत रानी लक्ष्मीबाई के शहर झांसी से हुई थी।
महंत विशाल गौड़ ने बताया कि पुराणों की मानें तो ऐरच जो कभी हिरणाकश्यप की राजधानी हुआ करती थी. यहां पर होलिका भक्त प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठी थी. जिसमें होलिका जल गई थी। होलिका दहन और होली को लेकर तमाम पौराणिक कथाएं हमारे धार्मिक ग्रंथों में मौजूद हैं, माना जाता है कि इस पर्व की शुरुआत राधा कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के तौर पर हर बरस मनायी जाती है।
महंत ने बताया कि त्योहार सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये लोगों को आपस में जुड़ने, खुशियाँ बाँटने और कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर प्रदान करते हैं। रंग-बिरंगी सजावट, रीति-रिवाजों, नृत्यों, संगीत और दावतों से समुदाय जीवंत हो उठते हैं, जो एकजुटता की भावना को दर्शाते हैं। त्योहार हमारे जीवन में खुशी, उल्लास और सामाजिक एकता लेकर आते हैं। ये हमें दैनिक तनाव से राहत देकर सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ते हैं। त्यौहार न केवल रिश्तों को मजबूत करते हैं और भाईचारे को बढ़ावा देते हैं, बल्कि परिवार और समुदाय के लोगों को एक साथ लाते हैं। यह हमारी संस्कृति का संरक्षण करने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी सहायक हैं। त्यौहार आनंद का स्रोत होते हैं, जिनसे हम अपने प्रियजनों के साथ यादगार पल बिताते हैं। ये खुशियाँ फैलाने में सहायक होते हैं। हमें विभिन्न वर्गों के लोगों के त्यौहारों के बारे में जानने का अवसर मिलता है। इससे हमें समाज में विभिन्न संस्कृतियों से जुड़ने में मदद मिलती है। होली का मुख्य संदेश यह है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमेशा अच्छाई की जीत होती है। यह हमें सिखाता है कि हमें किसी भी स्थिति में अपने मन को सकारात्मक बनाए रखना चाहिए और प्रेम और सद्भावना से जीवन जीना चाहिए।
Mahant Vishal Gawd Sri Kotvaleshver Mahadev Mandir Chawk Lucknow

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