सरकार अपने लक्ष्य से भटक गई

हुजै़फा
लखनऊ। 2014 के चुनावो में कहा गया था कि विदेशों में जमा काले धन को वापिस लाया जाएगा, देश के काले धन को जब्त किया जायगा नकली नोटों को चलन से बहार करेंगे, भ्रष्टाचार पर लगाम लगायगें, महंगाई पर कन्ट्रोल होगा, नौकरियों का लम्बे स्तर पर सृजन होगा, किसानों कि समस्या का स्थायी हल निकालेंगे , लोक कल्याण की अनेक योजनाओं को अम्ली जामा पहनाया जायेगा आदि। किन्तु बहुत सारी भाजपा की घोषणाएं धरातल पर नही उतर पाई जितनी जनता ने अपेक्षा की थी। यानि जनता ने जिस लिए सरकार बदली वह आज भी वैसी ही है या उससे ज्यादा बढ़ गई है। कालाधन तो आया नहीं उल्टा काले बजारियों को देश से भागने मे सफलता मिली। नोटबन्दी से काला धन सफेद हो गया और नकली करेंसी असली हो गई। कांग्रेस के दशको पुराने घपले खुद भाजपा ने अपनी नाकामी से ढक दिये। पांच साल तक सिर्फ बयानबाजी होती रही किसी भी भ्रष्टाचारी को जेल नहीं पहुंचाया गया। नोटबंदी और जीएसटी से बेरोजगारी बढी है, किसानों ने रिकार्ड तोड़ आत्महत्याऐं की, लोक कल्याण की योजनाएं अखबारों के विज्ञापनों तक सीमित रही अमलीजामे का नम्बर ही नही आया ये भी सरकारी आंकड़े बताते है। इस प्रकार देखते हैं कि सरकार अपने मूल लक्ष्य से भटक गई है और अब हताश और निराश होकर भावुक मुद्दों पर बयानबाजी हो रही है।
जातिवाद, धर्म आदि बयानों से जनता पर मनो वैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। कभी राष्ट्रीय सुरक्षा तो कभी पाकिस्तान का भय और आतंकवाद का भय दिखाया जा रहा है। हमारी सरकार कार्पोरेट सेक्टर के दबाव मे काम कर रही है। सरकार के नुमाइंदे अपने कामों से ज्यादा दूसरे की कमियों को बताने मे अपना समय लगा रहे है। यदि सरकार यह समझ रही कि उसने पांच सालो मे बेहतर काम किये तो वह विपक्ष से इतना भयभीत क्यूं है? विपक्ष को दबाने का मतलब ही होता है कि आप उससे खुद को कही कम समझ रहे हो। जनता को किसी पार्टी से कोई सरोकार नही होता वह बस सुख चैन से रहना चाहती है।

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