विपत्तिकाल में एकांतवास ही असली साधना

भारत एक बार फिर कोरोना नामक वायरस जनित महामारी की चपेट में है । सरकार द्वारा सम्पूर्ण देश में घोषित 21 दिन के लॉकडाउन से इसके खतरे का अंदाजा लगाया जा सकता है । लॉकडाउन का व्यवहारिक अर्थ कर्फ्यू है । देश के इतिहास में विदेशी आक्रमण, प्लेग, स्पेनिश फ्लू, देश का बटवारा, चीन और पकिस्तान से युद्ध, आपातकाल, श्रीमती इंदिरा गांधी और श्री राजीव गांधी की ह्त्या, सिख विरोधी दंगे, अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वंश जैसे अनेक संकट के समय आये लेकिन देश चलता रहा । अर्थ व्यवस्था चलती रही ।

आज सरकार को सब कुछ बंद करना पड़ा है । कारण भी है क्योंकि अमेरिका, चीन, जापान, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे उन्नत आर्थिक और उच्च स्वास्थ्य प्रदाता देश सभी उपाय करने के बाद भी इस महामारी के आगे बेबस होकर अपने नागरिकों को रोज़ रोज़ काल के गाल में समाते देख रहे है ।

हमारी चुनौतियां और कठिनाईयां बहुत अधिक हैं । किसी भी संक्रामक रोग के प्रसार में जनसँख्या, जनसँख्या घनत्व, यातायात की प्रचुरता और प्रतिदिन जनसंख्या का आवागमन महत्वपूर्ण कारक हैं । भारत की जनसंख्या 137 करोड़ है जो वैश्विक जनसंख्या का 17.7% है । देश का जनसंख्या घनत्व 420 और विश्व की 52 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है । जबकि देश के 20 बड़ी जनसंख्या वाले शहर का जनसंख्या घनत्व 8745 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है । इतने सघन जनसंख्या घनत्व वाले इलाके में किसी भी संक्रामक रोग का फैलकर अनियंत्रित हो जाना आश्चर्य का विषय नहीं है ।

देश में यातायात के प्रमुख साधनों में रेल, बस और हवाई जहाज हैं । इनके साथ व्यक्तिगत और पारम्परिक वाहन भी महत्वपूर्ण साधन हैं । देश में प्रतिदिन कुल 12,617 रेलों से 2.3 करोड़ लोग यात्रा करतें हैं । वर्ष 2016 के आंकड़े के अनुसार कुल 18 लाख सरकारी और गैर सरकारी बसों ने मिलकर रोज़ 7 करोड़ यात्री ढोये । वर्ष 2011 में नागर विमानन मंत्रालय द्वारा ज़ारी आंकड़े के अनुसार प्रतिदिन 3.20 लाख लोगों ने सफर किया । सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के वर्ष 2016 आंकड़ों के अनुसार भारत में 23 करोड़ पंजीकृत वाहन थे । एक परिकल्पना करते हैं कि इनमें से आधे वाहन से प्रतिदिन केवल एक ही व्यक्ति  ने यात्रा किया तो प्रतिदिन मात्र एकल यात्रियों की संख्या 11 करोड़ थी ।

इस प्रकार देश में प्रतिदिन कम से कम 20 से 21 करोड़ लोग यात्रा करतें हैं जो विश्व के पांचवे नम्बर की आबादी के बराबर है और पाकिस्तान तथा ब्राज़ील की जनसंख्या से ज़्यादा है । इतना विशाल यात्री समूह कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण के लिए सबसे अच्छा संवाहक है । इसलिए कोरोना के संक्रमण को प्रसार से रोकने के लिए यातायात के साधनों को रोक देने के अलावा कोई भी विकल्प नहीं है । चिकित्सकों की माने तो इस वायरस का सबसे सक्रिय संवाहक मनुष्य है अतः जनता के आवश्यक गति को भी आपातकाल मानकर रोकना मानव और देश हित में है ।

इस महामारी की विभीषिका को समझने के लिए देश की स्वास्थ्य सेवा को समझना पडेगा । दुनिया के 195 देशों में भारत का वैश्विक स्वास्थ्य सिक्योरिटी इंडेक्स 57 है । विश्व स्वाथ्य संगठन की रिपोर्ट 2016  के अनुसार भारत में प्रति 10,000 व्यक्ति डॉक्टरों की संख्या 7.8, नर्सों की संख्या 21.1, मरीज़ बिस्तर की संख्या 7 और फार्मेसी की संख्या 6.8 है । भारत सरकार के वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार देश में सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उच्चीकृत स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पतालों की संख्या 37,725  उनमें उपलब्ध बेड की संख्या 7,39,024 है । 43 करोड़ या 31 फीसदी शहरी आबादी के लिए कुल 3772 सरकारी अस्पताल और 4,31 ,173 बेड हैं जबकि 94 करोड़ या 69 फीसदी ग्रामीण आबादी के लिए मात्र 19810 सरकारी अस्पताल और 2,79,588 बेड हैं । सरकार के अन्य उपक्रमों के अस्पतालों की संख्या 39,209 और बेड़ों की संख्या 1,43,,825  हैं । कोरोना के संक्रमण की विभीषिका यदि इटली जैसी स्थिति में पहुँचता है तब देश की स्थिति का आंकलन केवल भगवान् भरोसे ही छोड़ना पडेगा । अतः ''रोकथाम इलाज से बेहतर है'' इस सूक्ति का अनुसारण करना ही पडेगा । कोरोना का संभावित संवाहक बनने से बचने के लिए सरकार के निर्देशों के अनुसार खुद को और परिवार के सभी सदस्यों को समाज से पृथक रखना ही प्रथम और अंतिम विकल्प है ।

रोग से संक्रमित होने की दशा में इलाज के लिए डॉक्टर, नर्स, फार्मेसी, अस्पताल और उपलब्ध बेड़ों की संख्या का आंकलन किया जा चुका है । अब यह देखना आवश्यक होगा कि हमारी सरकार और हम अपने स्वास्थ्य पर कितना खर्च करतें हैं । राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल से पता चलता है कि प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष स्वास्थ्य पर सरकार का खर्च केवल रुपये 1,657 है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य पर भारत का प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष रूपए 4717.19 खर्च है जो पड़ोसी देश भूटान और श्रीलंका से कम है। महामारी फैलने की दशा में आर्थिक संसाधन पूरी तरह से अपर्याप्त है इसलिए रोकथाम के लिए पृथक रहने के सिवाए अन्य कोई भी उपाय नहीं है ।

विकसित होने का अहंकार, धन-दौलत और तकनीकी का गुमान सभी कुछ कोरोना प्रलय के सामने बौने साबित हो रहें है । विश्व के दस संक्रमित देश अमेरिका, इटली, चीन, स्पेन, जर्मनी, ईरान, फ्रांस, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड हैं । अमेरिका, चीन और ईरान को छोड़कर शेष सात देश विकसित और शक्तिशाली यूरोप के हैं । ये तीनों देश भी समृद्धशाली और ताकतवर हैं ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आधिकारिक तौर पर कोरोना संक्रमण को एक महामारी घोषित किया है उसने सभी देशों से उन सभी प्रयासों को जारी रखने का आह्वान किया है जो संक्रमण को सीमित करने में प्रभावी रहे हैं।

चीन ने जनवरी के अंत तक बड़ी जनसंख्या वाले 16  शहरों को बंद करके जनता को घरों में पाबन्द किया । परिणामस्वरूप 40 दिन बाद 18 मार्च को वो दिन भी आया जब पूरे चीन में कोरोना संक्रमित एक भी नया मरीज़ नहीं मिला । इसके बाद कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए रूस, दक्षिण अफ्रीका, न्यूज़ीलैंड, सऊदी अरब, कोलंबिया, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जॉर्डन, अर्जेंटीना, इजराइल, बेल्जियम, जर्मनी, मलेशिया, चेक गणराज्य, फ्रांस, मोरक्को, केन्या, स्पेन, पोलैंड, कुवैत, आयरलैंड, नॉर्वे, ऐल साल्वाडोर, डेनमार्क, इटली जैसे देशों ने 15 मार्च तक लॉकडाउन या मिलती जुलती नीति के तहत जनता की गति को रोक दिया । भारत जागा तो लेकिन बहुत देर से, तब तक लाखों यात्री हवाई जहाज के द्वारा देश में आकर बिना किसी जांच प्रक्रिया से गुज़रे भीड़ में गुम हो चुके थे । ऐसे में सरकार द्वारा घोषित लॉकडाउन को मानने के अलावा अन्य कोई भी दूसरा उपाय नहीं है । जनता का सहयोगी रुख इस महामारी से लोगों को बचाने के लिए जूझ रहे शासन, प्रशासन, स्वयं सेवी संगठनों, आवश्यक सेवा में लगे व्यापारी और मीडिया से जुड़े कर्मयोगियों का उत्साहवर्धन करेगा । इस विपत्ति काल में एकांतवास ही असली साधना है ।

द्वारा,

रवीन्द्र प्रताप सिंह


9453218238

राष्ट्रीय संयोजक

अवध राज्य आंदोलन समिति

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