प्रकृति का उल्लास है सावन

प्रकृति का उल्लास है सावन

हुज़ैफ़ा  
लखनऊ / सावन यानि श्रावण के महीने का नाम सुनते ही मन बरसात के मौसम के आनंद में डूब
जाता है। रिमझिम फुहारें ग्रीष्म की झुलसन और आषाढ़ की हवा में भरी उमस को दूर
कर शरीर में एक नयी तरह की उमंग का संचार करती हैं। झूले इस उमंग को ही
अभिव्यक्ति भी देते हैं और इसमें बढ़ोतरी भी करते हैं। प्रकृति भी हरियाली के
जरिये मानो मन की प्रसन्नता ही व्यक्त करती है। इस माह पडऩे वाले त्योहारों की
रौनक नीरसता दूर कर देती है। इस बार श्रावण मास 17 जुलाई बुधवार से प्रारंभ हो
रहा है जो 14 अगस्त तक रहेगा। इस तरह यह महीना बुधवार से शुरू होकर
बुधवार को ही खत्म होगा। शिव उपासना के इस विशेष माह को श्रावण पुकारने के पीछे
भी धार्मिक महत्व और कालगणना के आधार हैं।

*क्यों कहते हैं श्रावण? *
हिंदू पंचांग के पांचवें महीने को श्रावण या सावन कहते हैं। शिव उपासना के इस
विशेष माह को श्रावण पुकारने के पीछे भी धार्मिक महत्व और कालगणना के आधार
हैं।दरअसल, हिन्दू पंचांग में भारतीय कालगणना और ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक
हर माह और दिन का नाम नियत हैं। हिन्दू वर्ष की शुरुआत चैत्र मास से होती है।
हर माह ग्रह-नक्षत्रों की चाल और स्थिति में बदलाव होता है। इसी क्रम में
पांचवें माह में या इसकी पूर्णिमा तिथि के साथ आसमान में श्रवण नक्षत्र का योग
बनता है। इसलिए श्रवण नक्षत्र के नाम से इस माह का नाम श्रावण रखा गया है, जो
सदियों में लोकभाषा में बदलकर सावन हो गया।

*धार्मिक महत्व*
धार्मिक दृष्टि से भी श्रावण मास का विशेष महत्व है। धर्म ग्रंथों के अनुसार
सावन मास में शिव आराधना का विशेष फल मिलता है। इस महीने में भक्त अलग-अलग
माध्यमों से शिव भक्ति में डूब जाते हैं। धार्मिक महत्व के नजरिये से श्रावण,
भादौ, आश्विन और कार्तिक चातुर्मास के चार माह होते हैं। चातुर्मास धर्म और
आध्यात्मिक  साधनाओं का विशेष और पुण्य काल माना गया है, जिसमें संत से लेकर
साधारण इंसान भी भक्ति और उपासना में डूबा रहता है, क्योंकि सावन से शिव भक्ति
से शुरू सिलसिला आगामी महीनों में शिव परिवार के अन्य सदस्यों की भक्ति और
उपासना के रूप में जारी रहता है। शिव कल्याणकारी देवता है। श्रावण में उनकी
भक्ति से शुरू हुआ शुभ और मंगल कामनाओं का दौर अगले चार माहों में गणेश उत्सव व
देवी आराधना के पर्व और त्योहारों के द्वारा मन व जीवन को शक्ति, ऊर्जा और नये
विचारों से भर देता है।

*सावन में शिव का पूजन*
हिंदू पंचांग के बारह मासों में सावन भगवान भोलेनाथ को सर्वाधिक प्रिय है।
इसीलिए शिव-भक्तों को सावन के सोमवार का व्रत अवश्य रखना चाहिए। प्रात:काल
स्नान के बाद गाय के दूध, दही, घी, शहद अथवा स्वच्छ जल से शिवलिंग का अभिषेक
करें, बेलपत्र चढाएं और चंदन लगायें। आक के फूल, धतूरा, धूप-दीप आदि अर्पित
करके किसी शिव स्त्रोत का पाठ एवं नम: शिवाय मंत्र का जप करें। दिनभर उपवास
रखें, सूर्यास्त के बाद प्रदोषकाल में पुन: शिवजी की अर्चना करने के बाद
सात्विक भोजन ग्रहण करें।

*शक्ति की आराधना*
परम पुरुष (शिव) और प्रकृति (भवानी) का प्रणय ही सावन की आध्यात्मिक आर्द्रता
है। शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसलिए सावन सदा से ही शिव-शक्ति
की अर्चना का पर्व काल रहा है। सावन के प्रत्येक मंगलवार को मंगलागौरी की विशेष
पूजा होती है। देवी पार्वती के इस अति विशिष्ट रूप का श्रीविग्रह वाराणसी के
पंचगंगा घाट पर विद्यमान है। मंगलागौरी का दर्शन-पूजन करने के लिए सावन के
प्रत्येक मंगलवार को यहां बहुत बडी संख्या में स्त्रियां आती हैं। पुराणों के
अनुसार मंगलागौरी की परिक्रमा करने से संपूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का पुण्यफल
मिलता है। इनकी उपासना से अविवाहित कन्याओं के मंगली-दोष का भी शमन होता है।

*नागपंचमी*
सर्प भगवान शंकर के आभूषण हैं। अत: नागपंचमी का पर्व भी इसी मास की शुक्लपक्ष
पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन रुद्रावतार श्रीहनुमान के ध्वजारोहण और
कुश्ती-दंगल की भी परंपरा है, जो इसे आध्यात्मिक स्वास्थ्य दिवस बना देती है।

*हरियाली तीज*
राजस्थान सहित उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में सावन के शुक्ल पक्ष की
तृतीया हरियाली तीज के नाम से विख्यात है। इस अवसर पर नवविवाहिताएं मायके जाती
हैं। इस दिन मेहंदी रचाना और हरी चूडियां पहनकर झूला झूलना अति शुभ माना जाता
है। इस दिन विवाहिताओं को मायके से विश्ेाष उपहार भेजा जाता है, जिसे सिंघारा
कहा जाता है। इस दिन विवाहिताएं जगदंबा से अखंड सुहाग का आशीष मांगती हैं। ऐसी
मान्यता है कि विरह की अग्नि में तपकर गौरी शिवजी से इसी दिन मिली थीं। हरियाली
तीज के दिन श्रीधाम वृंदावन में श्रीबांके बिहारीजी सोने के हिंडोले में
विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं।

*वैष्णवों का झूलनोत्सव*
सावन में ब्रज का झूलनोत्सव विश्वविख्यात है। श्रीवल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग)
में ठाकुरजी (भगवान श्रीकृष्ण) पूरे श्रावण मास में झूला झूलते हैं। मथुरा के
सुप्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर में पूरे माह झूलन का उत्सव बडे उत्साह के साथ
मनाया जाता है। श्रीनाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में पूरे माह हिंडोला
सजाया जाता है। जगन्नाथपुरी में श्रावण शुक्लपक्ष दशमी से पूर्णिमा तक ठाकुर
मदनमोहनजी को मुक्ति मंडप में सजाये गये झूले में झुलाया जाता है। श्रावण की
पूर्णिमा को जगन्नाथ श्रीकृष्ण के बडे भाई बलभद्रजी का जन्मोत्सव मनाया जाता
है।

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